सरस्वती चालीसा

राग

नमामी,शमीशान,निर्वाण रूपम् रूद्राष्टक

दोहा

सरस्वती कूप जल शक्ति ,अदभुत महिमा जणाय ।

ज्यूँ पीवे नीर बढत रहे, बिन वपरे सुकी जाय ।।

चालीसा

1)नमस्कार,नमस्कार, नमस्कार माता विधात्री अखिल लोक बुद्धि प्रदाता

2)श्वेताम्बरी, श्वेत पद्म, सुहाता श्वेत हंस वाहन,विवेक जगाता

3)चतुर्भुजी, हर युग ,प्रभावी तु दाता त्रिलोकी सहर्ष शीश, तुझको नवाता

4)वीणा धारी, सुरीली, सुरों की तु दात्री सकल साज,आवाज़, वाणी प्रदात्री

5)तु विद्या की दानी, गुणों की है खानी मुदिता मनावें सभी ज्ञानी, ध्यानी

6)जो रीझे सुधारें , संवारे सब साजा रूठे तो , बिगारे ,रूचे ना जो काजा

7)सदा सुनीति तेरे मन को लुभाती, अनीति, अनाचार , करना न चाहती ,

8)राम अभी बन पाए ना राजा , सुरन चाहे विघन बिगारन काजा

9)राम सहमति से , सराई कुकाजा माँगी ,क्षमा , शरणा तेरी महाराजा

10)हर्षित हुए सुर,असुरारी ठानी सरस्वती मन में छाई गलानी

11)स्वारथ डुबोदी ,परमारथ की नावी चोला अमर का, भाव ,विषधर सा हावी (सर्प के जैसा)

12)करो ऐसी किरपा , उपयोग सद करी जाणी जो मन भावे तेरे,वो आचरण मन लाणी

13)तुम ही वाक शक्ति ,अज्ञान मिटाती पुस्तक धारिणी ,तेजस्वी बनाती

14)नवदुर्गा में कालरात्रि, तुम ही हो धाती (धात्री) रक्तबीज संहारी,त्रास मुक्ति कराती

15)महागौरी रूप,शिव, सुंदर सजाती सौम्य स्वरूप सभी मन भाती

16)सिद्धीदात्री ,कारज सिद्ध कराती सदा शिव को भी सिद्धी प्रदाती

17)शुभंती माता ,शुभ आशिष दाती मंगल काज ,शुभ फल ,शुभ्रु अपाती (देती)

18)नीलसरस्वती ,रंग नीला धराती जो ध्यावे, वो बुद्धि मेधावी है पाती

19))तु जड़ता मिटाती,ब्रह्मा की हो राणी मति द्रुत ,विस्तारी,यशस्वी बनाती

20)जीतियो न जाए बली,निर्बल शरीरे युक्ति जीते,शब्द बाण तुनीरे

21)पार्वती अंशी,कुमारिका अबला नाम कौशिकी ,विख्याता,तु प्रबला

22)शुम्भासुर नाशिनी शारदा ,उग्रतारा महोग्रतारा, मातंगी निर्भय उबारा

23)हुंकारा से ,भसम (भस्म)किया ध्रुमलोचन धुमावती ,चण्ड ,मुंड विमोचन

24)शुम्भ निशुम्भ मारी , असुरारी हराई त्रिलोकी हरषाई,जयकारा लगाई

दुर्गम (राक्षस) को मारी ,दुर्गा केहलाई यशोदा की नंदजा,भ्रामरी, नाम मांई

26शताक्षी,हज़ार नेत्र अश्रु करूणा बहाई शाकम्भरी ,भरण पोषण कराई

27)व्यर्थ आडम्बर माता मन न सुहाता सरल स्वभाव ही तुझको रिझाता

28)केवल गुडधानी भोग रूची सो खाती मनोरमा ,मंगल काज सुझाती

29)ईडा, पिंगला,सुषुम्ना त्रिनाडी सुर्य, चंद्र ,सरस्वती कहाती

30)श्वांस,प्रश्वास प्राणायाम द्वारा आत्मज्योत के दर्शन करवाती

31)बुद्धि,मन, आत्मकल्याणि तुम माता दिव्यता दे ,विद् वान बनाती

31)कंठ बिराजी, सभी के वीणापाणी मधुरी सी सरगम मीठी बजाती

32)सृष्टि आवाज तुम ही से पाती बिना तेरी किरपा,गुंगी बन जाती

33)वेद उच्चारी,प्रभु को रिझाती गायत्री ,धीमही,ध्यान कराती

34)तुम मुढता,हटाओ ,मेरी जडता मिटाओ मायावती ,सत्यता समझाओ

अज्ञानी अंधकार ने मुझको डराया तेरी सन्निधि, कोटी सुर्य प्रगटाया

36)अब ना मोह ,ना ममता , मुझको सताती शाश्वत ,प्रेम ,तेरी संगत बढ़ाती

37)स्व को समझु खुद जानु पहचानु मेरे ज्ञान चक्षु ऐसे माँ खुलाओ

38)बन पाऊं, अपनी ही मैं, परम हितैषी कराओ करम ,प्रभु मन भावे जैसी

39)मंद बुद्धि कारण मैंने ,कई जनमों को खोया ,न सोया, न गोया (समझा),बस रोया ही रोया

40)निज कल्याण सुझाई ,मन से “मैं “दो हटाई तूही,तूही धुन में ,मोही रमाई ,झुमाई

मन:कामना दोहे- 1)परमारथी बनु वृक्ष,नदी,सुर्य के जैसा । प्रकृति के रंग में रंग जाऊँ मैं ऐसा ॥

2)शरणागति तेरी स्वीकारी,मैया अब लो मोहे अपनाई । हे आद्य शक्ति ,मन उच्चाटन हटाकर परम शांति अनुभाई ॥

3)संघर्ष नहीं सरलता दीजो,बालभाव न बिसराउ । परमानंद चखने जीवनी ,आनंद बन जी पाऊं ।।

फलश्रुति-• सरस्वती चालीसा जो नित नियम करे पाठ । माँ के मन वो प्रिय बने,परम शक्ति ,सदा निभाए साथ ।।

इति श्री सरस्वती चालीसा भगवती प्रेरित विश्यामा निमित्त माँ के श्रीचरणो में समर्पित आध्य शक्ति कल्याणीहस्तु ॥

॥विश्यामा ॥

ॐगम् गणपतये नम:

गणपति जी को प्रिय अथर्वशीर्ष वैदिक 

पाठ का सरलीकरण 

धरोहर से पाई प्रसादी को विश्यामा 

    केवल बांटनवार ।

आनंद रस की रागिनी आनंद पे न्यौछार ।।

             ।।अथर्व वेदीय शान्ति पाठ ।।

              ।।श्री गणेशाय नम: ।।

ॐभद्रम् (भद्रं)कर् णेभिह (कर्णेभि:)

शृणुयाम् देवाह् (देवा:) ।

भद्रम् (भद्रं)पश्येम्-अक्ष(पश्येमाक्ष)

भिर् य जत्राह् (भिर्यजत्रा:)।।

स्थिरे रंगैस् तुष्टुवाम् (स्थिरेरंगेस्तुष्टुवां)

सस्तनूभिह् (सस्तनूभि:)।

व्यशेम देवहितम् (देवहितं) यदायुह् (यदायु:)।।१।।

अर्थ:- हे देवगण हम अपने कानों से कल्याणकारी 

वचन ही सुने ।आँखों से भी मंगलमय रूप 

का ही दर्शन करे ।हम,हमारे स्वस्तिर अंगो के 

द् वारा देवों का स्तवन करें हमारा शरीर 

सुदृढ़ और पुष्ट हो जिससे देववृंद के लिए 

हितकर आयु का ,शरीर के द्वारा उपभोग 

 करते रहे ।

ॐस्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाह् (वृद्धश्रवा:)।

स्वस्ति नह् (न:)पूखा (पूषा) विश्ववेदाह् (विश्ववेदा:)।।

स्वस्तिन स्ताक्षरयो (स्वस्तिनस्ताक्षर्यो)

अरिष्ट नेमिह् (अरिष्टनेमि:)।

स्वस्ति नो बृहस्पतिर् दधातु (बृहस्पतिर्दधातु)।।२।।

ॐ शांति!शांति!!शांति:!!!

बडे हुए सुयश वाले जो इन्द्र भगवान है 

वे हमारे लिए मंगलमय हो कल्याणमय हो 

सर्वज्ञ पुखा (ऋग्वेद में पुषा)अर्थात् 

सुर्यदेव जो हमारे लिए मंगलमय हो 

ताक्षर्य अर्थात् अजेय गरूड़ जी मंगलमय हो 

बृहस्पति जी (देव गुरू)जी हमारे लिए 

मंगलमय हो ।हमारे तीन तरह के

(आधिदैविक,आधिभौतिक,आध्यात्मिक)

तापों की शांति हो ,शांति हो,शांति हो ।।

  अथ गणपति अथर्वशीर्ष 

अर्थ:-अब गणपति जी का अथर्वशीर्ष 

  ।।ॐनमस्ते गणपतये ।।

अर्थ:-ओंकार युक्त गणपति जी को नमस्कार है 

त्वमेव प्रत्यक्षम् (प्रत्यक्षं) तत्व मसि (तत्वमसि ।

त्वमेव केवलम् (केवलं)करता..सि (कर्ताऽसि)।।

त्वमेव केवलम् (केवलं)धरता..सि (धर्ताऽसि)।

त्वमेव केवलम् (केवलं)हरता..सि (हर्ताऽसि)

त्वमेव सरवम् (सर्वं)खलविदम् (खल्विदं)

ब्रह्मासि ।।

त्वम् (त्वं)साक्षाद आत्मा..सि (साक्षादात्माऽसि)

नित्यम् ।।१।।

अर्थ:- तुम ही प्रत्यक्ष तत्व हो ।

तुम ही केवल कर्ता हो अर्थात् करने वाले हो ।।

तुम ही केवल धर्ता अर्थात् धारण करने वाले हो 

तुम ही संहार करने वाले हो 

तुम ही समस्त विश्व रूप ब्रम्ह हो 

तुम ही साक्षात नित्य आत्मा हो 

ऋतम् (ऋतं)वच्मि ।।सत्यम् (सत्यं)वच्मि ।।२।।

अर्थ:-यथार्थ कहता हूँ सत्य कहता हूँ 

अव त्व माम् (मां)।।अव वक्तारम् (वक्तारं)।।

अव श्रोतारम् (श्रोतारं)।।अव दातारम् (दातारं)।।

अव धातारम् (धातारं)।।

अ वा नू चा न म व (अवनूचानमव)शिष्यम् (शिष्यं ।।

अव पश्चातात् ।।अव पुरस्तात् ।।

अव उत्तरातात् (अवोत्तरातात् ।।

अव दक्षिणात्तात् ।।

अव अवचोध्वारत्तात (अवचोध्वार्तात्)

अवधरात्तात् ।।

सर्वतो माम् (मां)पाहि पाहि 

समन्तात् (समंतात)।।३।।

तुम मेरी रक्षा करो।।

(वक्ता)बोलने वाले की रक्षा करो ।।

(श्रोता)सुनने वाले की रक्षा करो ।।

(दाता) देने वाले की रक्षा करो ।।

(धाता) पालन करने वाले की रक्षा करो ।।

षडंग वेद-विद जो वेद के अंग है उन 

आचार्य की रक्षा करो ।।

शिष्य की रक्षा करो ।।

पीछे से पृष्ठ भाग से रक्षा करो ।।

आगे से रक्षा करो ।।

उत्तर भाग से रक्षा करो ।।

दक्षिण भाग से रक्षा करो ।।

चारों ओर से मेरी रक्षा करो ।।

ऊपर से रक्षा करो ।।

नीचे से रक्षा करो ।।

सर्वतो भाव से मेरी रक्षा करो ।।

सर्व दिशाओं से मेरी रक्षा करो ।।

त्वम् (त्वं) वांग मयस्त्वम् (वाड;मयस्त्वं)

चिन्मयह् (चिन्मय:)।।

त्वम् आनंदमय् स्त्वम् (त्वमानंदमयस्त्वं) 

ब्रहम मयह् (ब्रह्ममय:) ।।

त्वम् (त्वं)सच्चिदानंद (सच्चिदानंदा)

द्वितीयो.. ऽ..सि (द्वितीयोऽसि ।।

त्वम् (त्वं)प्रत्यक्षम् (प्रत्यक्षं)ब्रम्हामि (ब्रह्मामि)।।

त्वम् (त्वं)ज्ञानमयो विज्ञानमयो.. ऽ.सि ।।

 (विज्ञानमयोऽसि )।।४।।

तुम वांग्मय हो,तुम चिन्मय हो,

तुम आनंदमय हो ,तुम ब्रहममयी

ब्रह्ममय हो ।तुम सच्चिदानंद 

  अद्वितीय परमात्मा हो 

परमेश्वर हो,तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो 

तुम ज्ञानमय-विज्ञानमय हो ।

सर्वम् (सर्वं) जगदिदम् (जगदिदं)

तवत्तो जायते ।

सर्वम् (सर्वं) जगदिदम् (जगदिदं)

तवत्तस्-तिष्ठति (तव्त्तस्तिष्ठति)।।

सर्वम् (सर्वं)जगदिदम् (जगदिदं) 

त्वयि लयमेष्यति ।

सर्वम् जगदिदम् (जगदिदं)

त्वयि प्रत्येति ।।

त्वम् (त्वं)भूमिर आपो -अनलो-अनिलो 

(भूमिरापोऽनलोऽनिलो)नभ:।

त्वम् (त्वं) चत्वारिवाक् पदानी 

(चत्वारिवाक् पदानी)।।५।।

यह सारा जगत तुमसे ही उत्पन्न 

होता है ।यह सारा जगत 

तुम में ही स्थित रहता है 

यह सारा जगत तुम मे ही 

लय होता है अर्थात् तुम्हारे भीतर ही 

समा जाता है ।तुमसे ही सारे 

जगत की प्रतिती होती है अर्थात् 

अनुभूति होती है ।तुम ही भूमि 

अग्नि,जल,वायु और आकाश हो ।

तुम ही परा,पश्यंति,मध्यमा और 

वैखरी ,चार प्रकार की वाक्शक्ति 

अर्थात् वाणी हो ।

त्वम् (त्वं)गुणत्रयातीतह् (गुणत्रयातीत:)।

त्वम्-अवस्था -त्रयातीत:।(त्वमवस्थात्रयातीत:)।।

त्वम् (त्वं)देह- त्रयातीतह् (देहत्रयातीत:)।

त्वम् (त्वं) काल-त्रयातीतह् (कालत्रयातीत:)।।

त्वम् (त्वं)मूलाधार-स्थितो..सि 

(मूलाधारस्थितोऽसि) नित्यम् (नित्यं)।

त्वम् (त्वं)शक्ति-त्रयात्मकह् (शक्तित्रयात्मक:)

त्वाम् (त्वां)योगिनो ध्यायन्ति (ध्यायंति)

नित्यम् (नित्यं)।।

त्वम् (त्वं)ब्रह्मा त्वम् (त्वं)विष्णु-स्तवम् 

(विष्णस्त्वं)।

रूद्रस्तवम् (रूद्रस्त्वं) इन्द्रस्तवम् (इंद्रस्त्वं)

अग्नि स्त्वम् (अग्निस्त्वं) ।।

वायुस्वम् (वायुस्त्वं) सूर्यस्त्वम् (सूर्यस्त्वं)

चन्द्रमा स्त्वम् (चंद्रमास्त्वं)।

ब्रहम भूर -भुवह् (ब्रहमभूर्भुव:) स्वरोम् ।।६।।

तुम सत्व,रज,तम इन तीनों गुणों से 

परे हो ।तुम स्थूल,सुक्ष्म और कारण 

इन तीनों देहों से परे हो ।तुम भूत 

भविष्य और वर्तमान तीनों कालों से 

परे हो ।तुम नित्य मूलाधार चक्र में 

स्थित हो ।तुम तीनों प्रकार की शक्तियों 

से संपन्न हो ।योगिजन नित्य तुम्हारा 

ध्यान करते है ।ऋिषिगण नित्य तुम्हारा 

ध्यान करते है ।तुम ब्रह्मा हो,तुम विष्णु हो 

तुम रूद्र हो ।तुम इंद्र हो,तुम अग्नि हो 

तुम वायु हो,तुम सुर्य हो,तुम चंद़मा हो ।

तुम ही सगुण ब्रह्म हो ,तुम निर्गुण 

त्रिपाद अर्थात् तीन चरण 

भूर,भुव:और स्व:(भूर्भुव:

 के रूप में हो ।तुम प्रणव 

अर्थात् ओंकार ,आप ही हो ।।

गणादिम् (गणादिं)पूर्व मुच्च आर्य (पूर्वमुच्चार्य)

वर्णादि तदन-अंतरम् (तदनंतरं ।

अनुस्वारह् (अनुस्वार:)परतरह् (परतर:)

अरधेन्दुलसितम् (अर्धेन्दुलसितं)

तारेण रूद्धम् (ऋद्धं) एतत्तव मनुस्वरूपम् (मनुस्वरूपं)

गकारह् (गकार:)पूर्वरूपम् (पूर्वरूपं)।।

अकारो मध्यम् रूपम् (मध्यमरूपं)।।

अनुस्वारश् चान्त्य रूपम् (अनुस्वारश्चान्त्यरूपं)

बिन्दु उत्तर रूपम् (बिन्दुरूत्तरूपं)।।

नादह् सन्धानम् (नाद:संधानं)।।

सँ हितासंधिह् (हितासंधि:)

सैषा गणेश विद्या (गणेशविद्या)।।

गणकऋिषिह् (गणेशऋिषि:)।।

निचृग्द गायत्री च छंदह् (निचृग्दायत्रीच्छंद:)

गणपतिदेवता ।।

ॐगँ गणपतये नम:।।७।।

गण शब्द के पहले अक्षर ग को पहले बोले 

उसके बाद वर्णो में प्रथम अक्षर अ को बोले 

उसके बाद अनुस्वार बोले ।इस प्रकार 

अर्धचन्द्राकार से युक्त शब्द गँ है जो 

ओंकार के साथ बोलने से शब्द बनेगा 

ओम गम् (ॐगँ)है इस गँ के आगे और 

पीछे ओंकार का संपुट लगाने से 

बीज मंत्र बनता है ॐगंॐ 

ग कार पूर्व रूप है अ कार मध्यम रूप है 

अनुस्वार अंत रूप है बिंदु उत्तर रूप है 

नाद संविधान है संहिता संधि है 

ऐसी यह गणेश विद्या है इस विद्या के 

गणक ऋिषी है निचृग गायत्री छंद है 

और गणपति देवता है ।मंत्र कुछ इस 

प्रकार है ॐगं गणपतये:नम: ।।

एकदंताय विद् महे ।

वक्रतुण्डाय धीमहि ।

तन्नो दंती प्रचोदयात् ।।८।।

एकदंत को हम जानते है वक्रतुण्ड 

का हम ध्यान करते है ।दंति हमको उस 

ज्ञान और ध्यान में प्रेरित करें ।यह 

गणेश जी की गायत्री है ।

एकदन्तम् (एकदंतं)चतुरहस्तम् (चतुर्हस्तं)

पाशम् अंकुश धारिणम् (पाशमंकुशधारिणम्)।।

रक्तम् (रक्त्तं)लम्बोदरम् (लंबोदरं)

शूर् प कर् ण कम् (शूर्पकर्णकं)रक्तवाससम् ॥

रक्त गन्ध अनुलिपतांगम् (रक्तगंधाऽनुलिप्तांगं)

रक्त पुष्पैह् (रक्तपुष्पै:)सुपूजितम् ।।

भक्ता नुकम्पिनम् (भक्तानुकंपिनं)देवम् (देवं)

जगत् कारणम् अच्युतम् (जगत्कारणमच्युतम्)।।

आविर भूतम् (आविर्भूतं)च सृष्ट यादौ (सृष्टयादौ)

प्रकृतेह् (प्रकृते:)पुरूषात् परम् (पुरूषात्परम्)।।

एवम् (एवं)ध या य ति (धयायति)यो नित्यम् 

स योगी योगिनाम् (योगिनां)वरह् (वर:)।।९।।

गणपति देव एक दांत और चार हाथों वाले है 

चार हाथों में वे पाश,अंकुश,दांत और वरमुद्रा 

धारण करते है उनके ध्वज में मुषक का चिंह है 

और वे लाल खुन के जैसे रंग के फूल और 

वस्त्र को धारण करते है उनके कान शूर्प अर्थात् 

सुपडे के जैसे है और पेट लंबा फैला हुआ है 

लाल रंग के चंदन से उनके अंग पर लेपन 

किया हुआ है इससे वो सुंदर लग रहे है 

लाल रंग के फूलों से वे पुजित है ।

भक्तों की कामनाओं को पूर्ण करने वाले 

ज्योतिर्मय स्वरूप,जगत के कारण रूप 

अच्युत (जिनको कोई भी डिगा नहीं सके)

ऐसे वे है सृष्टि की शुरुआत में प्रकृति 

और पुरुष के संयोग के कारण से अलग 

है ।ऐसे अलौकिक गणेश जी का जो ध्यान 

करता है वह सब योगियों में श्रेष्ठ है ।

नमो व्रात पतये (व्रातपतये)।

नमो गणपतये ।।

नमह् (नम:)प्रमथ पतये (प्रमथपतये)।

नमस्ते अस्तु (नमस्तेऽस्तु)

लंबोदरा यैक दन्ताय् (लंबोदरायैकदंताय)।

विघ्न नाशिने (विघ्नाशिने)शिव सुताय (शिवसुताय 

श्री वरद मूरतये (वरदमूर्तये)नमो नमह् (नम:)।।१०।।

व्रात (देव समूह)के नायक को नमस्कार 

गणपति को नमस्कार 

प्रथमपति (शिवजी के गणों के अधिनायक )

को नमस्कार 

लंबे उदर वाले,एक दांत वाले को,

विघ्न विनाशक को,शिवजी के पुत्र को 

और वरदान देने वाली वरद मूर्ति को 

नमस्कार-नमस्कार हो ।

फलश्रुति:-

एतद अथर् व (अथर्व)शीर् ष (शीर्ष)

एतद् अथर्वशीर्ष य ओ धीते (योऽधीते)।।

स ब्रह्म भूयाय (ब्रह्मभूयाय)कल्पते।।

स सर्व विघ्नैर् न बाध्यते (विघ्नैर्नबाध्यते)।।

स सर्वतह् (सर्वत:)सुख मेधते (सुखमेधते)।।

स पन्च महापाप आत् प्रमुच्य ते 

(पंचमहापापात्प्रमुच्यते)।।11)

यह अथर्शीर्ष(अथर्ववेद का उपनिषद)है 

इसका पाठ जो करता है वह ब्रह्म को 

प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है 

सब प्रकार के विघ्नों से वह मुक्त हो जाता है 

अर्थात् उसे किसी भी तरह के विघ्न परेशान 

नहीं करते है ।सभी जगह सुख पाता है ।

वह पाँच प्रकार के पातक अर्थात् दोषों से 

और उपपातक अर्थात् पाप से संबंधित 

अन्य ओर पाप-दोष से छुट जाता है 

सायम धीयानो (सायमधीयानो)

दिवस कृतम् (दिवसकृतं)पापम् (पापं)

नाश यति (नाशयति)

सायम् -प्रातह् (सायंप्रात:) प्रयुम् जानो (प्रयुंजानो)

अपापो (ऽपापो)भवति ।।

सर् व त्रा धीयानो (सर्वत्राधीयानो)

अपविघ्नों (ऽपविघ्नो)भवति ।।

धरमारथ(धर्मार्थ)काम,मोक्षम् (मोक्षं)

(धर्मार्थकाममोक्षं)च विन्दति (विंदति)।।12।।

सांय काल अर्थात् शाम के समय इसका 

पाठ करने वाला दिन के समय हुए पाप 

दोष से छुट जाता है प्रातः काल अर्थात् 

सुबह के समय पाठ करने वाला रात्रि 

के पापों से छुट जाते है जो सुबह-शाम 

दोनों समय पाठ करते है वे निष्पाप हो 

जाते है ।वह सर्वत्र विघ्नों का नाश करने वाला 

विघ्न शून्य हो जाते है और धर्म अर्थ काम मोक्ष 

चारों पुरुषार्थ को प्राप्त करता है ।

इदम अथर् व शीर् ष म (अथर्वशीर्षम)

अशिषया य ((अशिष्याय) न देयम् ।।

(इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्)

यो यदि मोहाद् दास्यति (मोहाद् दास्यति)

स पापी यान् (पापीयान् )भवति ।

सहस्र आवर् त नात् (सहस्रावर्तनात्)

यम् यम् (यं यं )काम मधीते (काममधीते)।।

तम् (तं) तमनेन साधयेत् ।।13।।

इस अथर्वशीर्ष को जो शिष्य न हो अर्थात् 

गणपति जी के प्रति सद्भावना रखनेवाला ,

उनका भक्त न हो उसे नहीं देना चाहिए 

जो मोह के कारण ऐसे लोगों को

अथर्वशीर्ष का पाठ करने का कहेगा 

वह महापापी हो जाएगा ।

इसका एक हज़ार बार पाठ करने से 

उपासक जो जो कामना चाहेगा उसकी 

सिद्धि इस मंत्र के द्वारा अवश्य प्राप्त करेगा 

अनेन गणपतिम् अभिषिंचति 

(गणपतिमभिषिंचति)स वाग्मी भवति 

चतुथ्याम अनश्नन् (चतुथ्यामनश्नन्)

जपति स विद्यावान भवति ।।

इत्य अथर्व वर्ण वाक्यम् (इत्यथर्वणवाक्यं)।।

ब्रह्मा घा वरणम् (ब्रह्माघावरणं)विघात् ।।

न बिभेति कदाच नेति (कदाचनेति ।।14।।

जो इस मंत्र को बोलते हुए गणपति जी 

को स्नान करवाता है अर्थात् अभिषेक 

करता है वह वक्ता बन जाता है ।जो 

चतुर्थी तिथि को उपवास करके जपता है 

वह विद्यावान हो जाता है यह अथर्ववेद का 

वाक्य है जो इस मंत्र के साथ तप करना 

जानता है वह कभी भी किसी से भी भयभीत 

नहीं होता है ।

यो दुर्वा अंकुरै (दुर्वांकुरैंर्यजति)यजति 

स वैश्रवण ओपमो (वैश्रवणोपमो)भवति ।।

यो लाजैर् यजति (लाजैर्यजति)

स यशोवान् भवति ।।

स मेधावान भवति ।।

यो पोरक सहस्त्रेण यजति 

स वान्छेत फलम् प्राप्नोति (वांछेतफलमवाप्नोति)

यह् (य:)साज्य समिभिर्द यजति (समिभिदर्यजति)।।

स सर् व (सर्व)लभते स सर्व लभते ।।15।।

जो दुर्वा चढ़ाते हुए इस मंत्र का जाप 

करता है वह कुबेर के समान धनवान बनता है 

जो लाजो अर्थात् सफ़ेद रंग के परमल की तरह 

एक चांवल का धान जो दीपावली लक्ष्मी जी की 

पुजन में भी लेते है जिसे फुलिया (लाई)भी कहते 

है उसको चढ़ाते हुए इस मंत्र का जाप 

करता है वह यशस्वी होता है मेधावी होता है 

जो हजार लड्डू चढ़ाते हुए इस मं त्र का जाप 

करता है वह अपनी मनोकामना को 

पुरी करता है अर्थात् इच्छित फल को प्राप्त 

कर लेता है जो हवनकुंड में घी की आहुति 

समिधा के साथ इस मंत्र का जप करते 

हुए देता है उसे गणपति जी की विशेष कृपा 

से सभी कुछ प्राप्त होता है ।

अष्टो ब्राह्मणान् सम्यग ग्राह यित्वा 

(सम्यग्ग्राहयित्वा)

सूर्य वरचस्वी (वर्चस्वी)भवति ।।

सूर्य गृहे (सूर्यगृहे) महानद् दाम (महानद्दां)

प्रतिमा संनिधौ (प्रतिमासंनिधौ)

वा जपत्वा सिद्ध मंत्रो (सिद्धमंत्रो)भवति ।।

महा विघ्नात् प्रमुच्यते (महाविघ्नात्प्रमुच्यते)

महान दोषात प्रमुच्यते (महांदोषात्प्रमुच्यते)

महापापात् प्रमुच्यते ।।

स सर्व विद् भवति स सर्व विद् भवति 

(सर्व विद्भवति)स (सर्व विद्भवति)

य एवम् (एवं) वेद इत्य उपनिषद

 (इत्युपनिषद्)।।16।।

आठ ब्राह्मणों के साथ इस मंत्र का जाप 

करने से मनुष्य सूर्य के समान तेजस्वी 

होता है ।सूर्य ग्रहण के समय में,बड़ी 

नदियों के पास बैठकर,अर्थात् उनके तट 

पर बैठकर अथवा गणपति जी की मूर्ति 

के पास बैठकर इस मंत्र का जाप करने से 

इस मंत्र की सिद्धि प्राप्त होती है ।वह 

व्यक्ति महाविघ्नों,महादोषों महापापो से 

मुक्त हो जाता है वह सर्वज्ञ अर्थात् सबकुछ 

जानने वाला बन जाता है ऐसा वेदों में और 

उपनिषदों में लिखा गया है ।

जो इस उपनिषद को जानता है वह महान है ।

।।अथर्ववेदीय गणपति उपनिषद समाप्त ।।

।।अथर्वण वेदीय शान्ति पाठ ।।

ॐभद्रम् (भद्रं)कर् णेभिह (कर्णेभि:)

शृणुयाम् देवाह् (देवा:) ।

भद्रम् (भद्रं)पश्येम्-अक्ष(पश्येमाक्ष)

भिर् य जत्राह् (भिर्यजत्रा:)।।

स्थिरे रंगैस् तुष्टुवाम् (स्थिरेरंगेस्तुष्टुवां)

सस्तनूभिह् (सस्तनूभि:)।

व्यशेम देवहितम् (देवहितं) यदायुह् (यदायु:)।।१।।

अर्थ:- हे देवगण हम अपने कानों से कल्याणकारी 

वचन ही सुने ।आँखों से भी मंगलमय रूप 

का ही दर्शन करे ।हम,हमारे स्वस्तिर अंगो के 

द् वारा देवों का स्तवन करें हमारा शरीर 

सुदृढ़ और पुष्ट हो जिससे देववृंद के लिए 

हितकर आयु का ,शरीर के द्वारा उपभोग 

करते रहे ।

ॐस्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाह् (वृद्धश्रवा:)।

स्वस्ति नह् (न:)पूखा (पूषा) विश्ववेदाह् (विश्ववेदा:)।।

स्वस्तिन स्ताक्षरयो (स्वस्तिनस्ताक्षर्यो)

अरिष्ट नेमिह् (अरिष्टनेमि:)।

स्वस्ति नो बृहस्पतिर् दधातु (बृहस्पतिर्दधातु)।।२।।

ॐ शांति!शांति!!शांति:!!!

बडे हुए सुयश वाले जो इन्द्र भगवान है 

वे हमारे लिए मंगलमय हो कल्याणमय हो 

सर्वज्ञ पुखा (ऋग्वेद में पुषा)अर्थात् 

सुर्यदेव जो हमारे लिए मंगलमय हो 

ताक्षर्य अर्थात् अजेय गरूड़ जी मंगलमय हो 

बृहस्पति जी (देव गुरू)जी हमारे लिए 

मंगलमय हो ।हमारे तीन तरह के

(आधिदैविक,आधिभौतिक,आध्यात्मिक)

तापों की शांति हो ,शांति हो,शांति हो ।।

।।इति श्री गणपत्य अथर्वशीर्ष समाप्तम् ।।

॥विश्यामा ॥